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Thursday, 2 February 2017

इन्द्रियों की हड़ताल


एक बार की बात है, एक दिन शरीर की इन्द्रियों ने सोचा कि हम लोग मेहनत कर करके मर जाते है और यह पेट हमारी कमाई मुफ्त में ही खा जाता है । अब से हम कमाएंगे तो हम ही खाएंगे, नहीं तो आज के बाद काम करना ही बंद । इस विचार पर सबने सहमति दिखा दी । जब पेट को इस प्रस्ताव का पता चला तो बोला - में तुम्हारी कमाई खुद नहीं रखता हूं, जो कुछ तुम लोग देते हो उसे तुम्हारी शक्ति बढ़ाने के लिए तुम्हारे ही पास वापिस भेज देता हूं । मेरा विश्वास करो तुम्हारी मेहनत तुम्हे ही वापिस मिल जाती है । यह बात इन्द्रियों के समझ नहीं आई और उनकी नाराज़गी बनी रही । आपस में रखे गए प्रस्ताव के अनुसार, सभी इन्द्रियों ने काम करना बंद कर दिया । पेट को भोजन नहीं मिला तो वह भूक से तड़पने लगा । खुद के शिथिल पड़ने पर अब वह दूसरे अंगो को भी ऊर्जा देने में असमर्थ हो गया जिसकी वजह से शरीर के सारे अंगो की शक्ति खत्म होने लगी । शरीर का ऐसा हाल देख कर मस्तिक ने इन्द्रियों से कहा - अरे मूर्खो ! तुम्हारा परिश्रम कोई नहीं खा रहा । वह लौटकर तुम्हे ही मिलता है । यह मत सोचो की दुसरो की सेवा से तुम्हे नुकसान होता है, जो तुम दुसरो को देते हो वो ब्याज समेत तुम्हारे पास वापिस लौटकर आता है । भोजन से मिलने वाली ऊर्जा के आभाव से जूझ रही इन्द्रियों को आपसी सहयोग की वास्तविकता समझ आ गई थी । उन्होंने वापिस एक पल गवाये पहले की तरह काम करना शुरू कर दिया और फिर कभी शिकायत नहीं की ।

जीवन मंत्र - कार्य की सफलता का ताज किसे भी मिले पर वो बिना सामूहिक पुरुषार्थ के संभव नहीं हो सकता । 

Sunday, 29 January 2017

पुरुषार्थ से स्वर्ग प्राप्ति


एक बार की बात है एक साधु नदी के किनारे बैठ कर माला जप रहा था । ऐसा करते देख साधु को एक दूसरा व्यक्ति काफी देर से देख रहा था । काफी समय होने के बाद जब उस से रहा ना गया तो वह साधु के पास पंहुचा और उनसे बोला, 'आप इतनी देर से क्या करे रहे है ?' साधु बोला, 'देखते नहीं ? में कठिन जप कर रहा हूं ।' उस व्यक्ति ने साधु से पूछा 'आपके इस जप से क्या होगा ?' साधु थोड़ा मुस्कुराते हुए बोले, ' इससे स्वर्ग की प्राप्ति होगी, यही कारण है की में इतनी देर से यहाँ कठिन जप कर रहा हूँ |' यह सुन वह व्यक्ति वही साधु के पास बैठ गया और पास में जमीन पर पड़ी बालू उठा-उठा कर नदी में फेकने लगा । जब साधु ने उसे ऐसा करते देखा तो पूछा, 'तुम यह क्या कर रहे हो ?' वह व्यक्ति बोला, 'में नदी पुल बना रहा हूँ |' साधु बोला - 'वत्स, पुल इस तरह नहीं बना करते । उसके लिए इंजीनियर, श्रमिक, सामान और जरुरी धन जुटाना पड़ता है । उनके समन्वित प्रयासों से पुल तैयार होते है । महज बालू डालने से पुल नहीं बनने वाला ।' साधु की यह बात सुन कर वह व्यक्ति तुरंत पलट कर बोला, 'हे साधु यही तो में कहना चाहता हूँ की सिर्फ मंत्र बोलने या माला जपने से स्वर्ग नहीं मिल सकता । इसके लिए संयम, ज्ञान, पुरुषार्थ जैसे पुण्य भी तो करने होंगे ।' एक आम आदमी से ऐसी महत्वपुर्ण बात सुनकर साधु की आँखे खुल गई । उसने अपनी भूल स्वीकार की और फिर कर्मयोगी बन गया ।

जीवन मंत्र - अपने कर्मो को पूरी ज़िम्मेदारी से करना ही सच्चा जप है |


Saturday, 28 January 2017

सच्ची साधना - कर्तव्य पालन


एक बार की बात है, एक राजा था एकाएक उसकी इच्छा सन्यास लेने की हुई और वो अपना महल छोड़ कर जंगल की ओर चल दिया । काफी दूर तक चलने के बाद उसे एक छोटी सी झोपडी दिखाई दी । यह झोपडी एक किसान की थी । काफी देर चलने की वजह से राजा थक गया था और काफी भूखा भी था । उसने किसान से कुछ खाने के लिए माँगा । किसान ने हांड़ी में खिचड़ी डाल दी और राजा से कहा की अब आप इतना कर दीजिये की चूल्हा जलाकर इसे पका दीजिये । जब यह पक जाये तब मुझे आवाज़ देकर बुला लीजिएगा । हम दोनों इसे खाकर पेट भर लेंगे । राजा ने ऐसा ही किया । जब खिचड़ी पक गई तो राजा ने बाहर काम कर रहे किसान को आवाज़ देकर बुला लिया । दोनों अपनी अपनी थाली में परोसकर खाने लगे । किसान ने राजा से कहा - खिचड़ी रूपी काम भगवान ने दिया है । इसके लिए चूल्हा जलाने और इसे पकाने जैसे पुरुषार्थ का काम हम मनुष्य को करना होता है । आप साधना करना चाहते है न, तो कर्मयोग की साधना करे । अपने कर्तव्यों का पालन करे । अगर आप प्रजा के सुख के लिए काम करेंगे और अपने कर्तव्यों को ठीक ढंग से निर्वाह करेंगे तो इससे आपको परम संतोष मिलेगा । किसान की इन बातों से राजा को गूढ़ तत्वज्ञान समझ आ गया । वह खिचड़ी खाने के बाद चुपचाप अपने राज्य को लौट गया और वहां राज्य के भले में कार्य करने में पुरे मन से जुट गया ।

जीवन मंत्र - मनुष्य के जीवन की सच्ची साधना अपने कर्तव्यों का पालन करना है |